बॉलीवुड के ग्रेट शो मैंन राज कपूर उर्फ श्री 420 – Raj kapoor Biography

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हिंदी सिनेमा में शोमैन के नाम से जाने जाने वाले राज कपूर Raj Kapoor का बॉलीवुड में बहुत बड़ा योगदान रहा। राज कपूर हिंदी सिनेमा के बहुत अच्छे और जाने मने अभिनेता , निर्माता और निर्देशक थे।  उन्होंने अपने जीवन में 3 राष्ट्रीय फिल्म अवार्ड्स और 11 फिल्मफेयर अवार्ड जीते और उनको दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

Raj Kapoor(राज कपूर) का प्रारंभिक जीवन और उनका बैकग्राउंड

Raj Kapoor on Shree 420 set
Raj Kapoor on Shree 420 set

राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर 1924 को पेशावर(अब पाकिस्तान में)  में ढक्की मुनव्वर शाह में एक हिन्दू पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम रणबीर था राज नही और यही नाम बाद में उनके पोते का रखा गया। राजकपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर और माता रामसरणी देवी कपूर थी।पृथ्वीराज कपूर से ही कपूर खानदान की शुरुआत होती है जो वर्तमान में हिंदी सिनेमा में सबसे बड़ा फ़िल्मी खानदान है। पृथ्वीराज कपूर ने भारत की पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” में सहायक अभिनेता के तौर पर अभिनय किया था। पृथ्वीराज कपूर के 4 संताने थी।राजकपूर सबसे बड़े थे। राजकपूर ने भी अपने पिता के सामान बॉलीवुड में नाम कमाया और राजकपूर की तरह शम्मी कपूर और शशि कपूर ने भी फिल्मो में अपनी अलग पहचान बनाई।

राज कपूर बाल कलाकार के रूप में

राजकपूर ने पांच वर्ष की उम्र में एक नाटक “मृच्छकटिक” में काम किया था। 1935 में 10 वर्ष के उम्र में पहली बार पर्दे पर “इन्कलाब ” फिल्म में नजर आये। राजकपूर के पिताजी ने शुरुवात से ही अपने बच्चो को मेहनत का महत्व समझाया था इसलिए उनसे फिल्म के क्रू मेम्बर की तरह व्यवहार करते थे और उन्हें जीवन की सीख दिया करते थे। राजकपूर ने बॉम्बे टॉकीज की कई फिल्मो के लिए भी बतौर सहायक निर्देशक का काम किया था और इस तरह वो अपने पिता के पृथ्वी थिएटर और बॉम्बे टॉकीज दोनों के लिए काम करने लगे थे।

राजकपूर फिल्म असिस्टेंट के रूप में

पृथ्वीराज कपूर राज कपूर को बतौर सहायक 201 रूपये महीना दिया करते थे। राजकपूर उन दिनों केदार शर्मा के लिए Clapper Boy का काम करते थे और केदार शर्मा “विष कन्या” फिल्म बना रहे थे। एक शाम जब इस फिल्म के दृश्य को फिल्माना था तब राज कपूर वह पुहंचने में लेट हो गए।  उस दिन राजकपूर की इस हरकत पर  केदार शर्मा ने गुस्सा होकर उनको थप्पड़ मार दिया। राजकपूर ने कोई  प्रतिक्रिया नही की और एक शब्द भी नही बोले।

राज कपूर का उनको कुछ न बोलना उनके दिल को छू गया और अगली ही सुबह उन्होंने राज को अपनी अगली फिल्म “नीलकमल ” में हीरो का रोले देना का वादा किया।राजकपूर को जब हीरो के रोल का ऑफर दिया तो वो खूब रोये। और उन्हें तब रोना इसलिए नही आया के शर्मा ने उन्हें थप्पड़ मारा बल्किइसलिए आया कि  एक डायरेक्टर ने उनको काम दिया इसलिए दिल भर आया था। राजकपूर ने 1947 में केदार शर्मा की “नील कमल” बतौर हीरो अभिनय किया जिसमे उन्होंने मधुबाला के साथ काम किया था | इसी साल उन्होंने चार ओर फिल्मे “चितचोर ” दिल की रानी और जेल यात्रा में भी अभिनय किया और उनमे भी उनकी Co-star मधुबाला ही थी।

R.K.स्टूडियो की स्थापना और फिल्मे

1948 में राज ने R. K. फिल्म स्टूडियो की स्थापना की। वे उस दौर से सबसे कम उम्र के फिल्म निर्देशक बने। उन्होंने अपनी पहली फिल्म आग बनाई और उस दौर के सबसे कम उम्र के फिल्म निर्देशक बने। इस फिल्म के निर्माता , निर्देशन के साथ उन्होंने मुख्य अभिनेता का किरदार भी  निभाया। इसके बाद भी उन्होंने कई फिल्मे की और सभी सफल रही।

50 के दशक में उन्होंने R.K. Banner के तले पहली फिल्म “आवारा” बनाई।  इस फिल्म में राजकपूर के साथ नर्गिस एक बार फिर रोमांटिक जोड़ी के रूप में नजर आये। आवारा फिल्म ने राज  कपूर को ना केवल भारत बल्कि पुरे विश्व में स्टार बना दिया | रूस, तुर्की ,अफ़ग़ानिस्तान और चीन में लोगो की जुबान पर “आवारा हु ” गाना छा गया। 1955 में राजकपूर एक ओर हिट फिल्म “श्री 420 ” लेकर आये जिसमे उन्होंने “”भारतीय चार्ली चैपलिन ” की छवि को हिंदी सिनेमा में  उतारा | इस फिल्म के मुकेश द्वारा गाये जाना वाला गीत “मेरा जूता है जापानी ” स्वतंत्र भारत के लिए एक देशभक्ति गीत के रूप में सामने आया। 50 के दशक में राजकपूर के अन्य प्रसिद्ध फिल्मे चोरी चोरी , फिर सुबह होगी , अब दिल्ली दूर नही , दो उस्ताद , अनाडी जैसी फिल्मे थी जिसमे अधिकतर फिल्मो में सामाजिक संदेश छुपा हुआ था।

रोमैंटिक जोड़ी का अंत

1956 में राज कपूर ने “जागते रहो ” फिल्म नरगिस के साथ बनाई और R.K. Banner के साथ उनकी अंतिम फिल्म थी। ऐसा कहा जाता है कि लगातार कई फिल्मे साथ करने की वजह से राजकपूर और नर्गिस में नजदीकिय बढ़ गयी थी तब नर्गिस ने राजकपूर के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन राजकपूर ने मना करते हुए कहा कि “मै अपनी पत्नी को अभिनेत्री नही बना सकता और अपनी अभिनेत्री को अपनी पत्नी नही बना सकता“| उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन में अन्य अभिनेताओ की तरह दरारे नही आने दी थी जबकि स्क्रीन पर उनके रोमांस का मुकाबला कोई कर ही नही सकता था। नर्गिस ने इस फिल्म के बाद राजकपूर के साथ कभी काम नही किया और सुनील दत्त से शादी कर ली। इस तरह एक रोमांटिक कपल का अंत हुआ था जिसने ढेरो युवाओ को प्रेम करना सिखाया था।

अन्य फिल्मे और पुरस्कार

राजकपूर ने “जिस देश में गंगा बहती है ”  पहली सुपरहिट फिल्म दी। इस फिल्म ने कई फिल्म फेयर अवार्ड भी जीते थे। इस फिल्म के बाद उन्होंने छलिया . नजराना , आशिक , एक दिल के सौ अफसाने और “दिल ही तो है” फिल्मो में काम किया।

राजकपूर की यह पहली रंगीन फिल्म “संगम “ थी जो उन्होंने खुद निर्मित और निर्देशित की।

1970 में  राजकपूर ने अपने जीवन की सबसे प्रिय फिल्म “मेरा नाम जोकर” बनाई जिसमे भी राजकपूर स्वयं निर्माता और निर्देशक थे।1971 में Raj Kapoor राजकपूर ने अपने बड़े बेटे रणधीर कपूर को फिल्मो में उतार और “कल आज कल ” फिल्म बनाई।  उसके बाद 1973 में उन्होंने अपने बेटे ऋषि कपूर कोlekar “बॉबी ” फिल्म बनाई |  इस फिल्म में डिंपल कपाडिया को अभिनेत्री के तौर पर उतारा गया। इस फिल्म की लव स्टोरी ने ऋषि कपूर और डिम्पल दोनों को रातो रात स्टार बना दिया। 70 के दशक में उनकी ओर प्रिसद्ध फिल्मे नौकरी , और दो जासूस थी। 1982 में अपने पुत्र को फिल्म प्रेम रोग में बतौर अभिनेता काम दिया। 1985 में उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर को “राम तेरी गंगा मैली ” के जरिये फिल्मो में उतारा जो राजीव कपूर की एकमात्र सबसे सफल फिल्म थी | बतौर निर्माता और निर्देशक “राम तेरी गंगा मैली ” उनकी अंतिम फिल्म थी और 1982 में “वकील वधु: फिल्म में अंतिम बार फिल्मो में नजर आये थे। उनका अंतिम एक्टिंग रोल 1984 में ब्रिटिश टीवी फिल्म “किम” में था जिसमे वो cameo appearance में नंजर आये थे।

Raj Kapoor
Raj Kapoor in Mera Naam Joker

उनकी निजी जिंदगी और मौत

1946 में  राजकपूर ने कृष्णा मल्होत्रा से शादी की।उनकी शादी एक arrange मैरिज थी जिसे उनके पिता ने तय किया था।राजकपूर को हमेशा से अपनी एक्ट्रेस के साथ रोमांस करते हुए देख लोगो ने प्रेम बंधन में बंधे होने की बात कही। कभी नरगिस के साथ तो कभी संगम फिल्म में साथ काम करने वाली वैजयंतीमाला के साथ। इसके बाद भी हर अभिनेत्री के साथ राजकपूर का नाम जोड़ा गया लेकिन उन्होंने बिना क्रोध किये इन सब बातो को नकारा।

हिंन्दी सिनेमा में राज कपूर का अपार योगदान रहा। हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कार और 11 फिल्मफेर पुरस्कार जीते और भारत सरकार द्वारा 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 1987 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

Raj Kapoor अपने अंतिम दिनों में अस्थमा से पीड़ित थे और 63 वर्ष की उम्र में 2 जून 1988 को इस दुनिया से विदा हो गये  जिस समय उनको अस्थमा के अटैक के लिए एम्स में भर्ती किया गया था उस समय उनको दादा साहब फाल्के पुरुस्कार मिलने वाला था | अस्थमा की वजह से वो एक महीने तक भर्ती रहे थे। उनकी म्रत्यु के समय वेद हीन फिल्म पर काम कर रहे थे।उनके बाद उनके बेटे रणधीर कपूर ने इस फिल्म को पूरा किया और यह फिल्म सफल भी रही।
कपूर फैमिली के बारे में सब जानते है क्योकि यह हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर बड़ी और पुरानी  फैमिली है।

Raj Kapoor
The Kapoor Family

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